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Thursday, January 28, 2016

भानगढ़ किले का रहस्य

राजस्थान के भानगढ़ Bhangarh का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है| इस किले की यात्रा के लिए अलवर व जयपुर से सड़क मार्ग द्वारा जाया जा सकता है रेल मार्ग से भी दौसा रेल्वे स्टेशन से उतर कर सड़क मार्ग से इस जगह पहुंचा जा सकता है दौसा से भानगढ़ की दुरी २२ किलोमीटर है| जबकि जयपुर व अलवर दोनों जगहों से लगभग ८० किलोमीटर है|

भानगढ़ के किले व नगर की उजड़ने की कई कहानियां प्रचलित है जिनमें रानी रत्नावती व एक तांत्रिक की कहानी प्रमुख है, प्रचलित जनश्रुतियों में किसी में रत्नावती को भानगढ़ की रानी बताया गया है तो किसी कहानी में भानगढ़ की सुन्दर राजकुमारी| पर दोनों ही कथाओं में इस पात्र के साथ सिंधु सेवड़ा नामक तांत्रिक का नाम व उसका कुकृत्य जरुर जुड़ा है|


प्रचलित कहानी के अनुसार सिंधु देवड़ा महल के पास स्थित पहाड़ पर तांत्रिक क्रियाएँ करता था वह रानी रत्नावती के रूप पर आसक्त था| एक दिन भानगढ़ के बाजार में उसने देखा कि रानी कि एक दासी रानी के लिए केश तेल लेने आई है सिंधु सेवड़ा ने उस तेल को अभिमंत्रित कर दिया कि वह तेल जिस किसी पर लगेगा उसे वह तेल उसके पास ले आएगा| कहते है रानी ने जब तेल को देखा तो वह समझ गई कि यह तेल सिंधु सेवड़ा द्वारा अभिमंत्रित है कहते है रानी भी बहुत सिद्ध थी इसलिए उसने पहचान करली और दासी से उस तेल को तुरंत फैंकने को कहा| दासी ने उस तेल को एक चट्टान पर गिरा दिया| कहते है अभिमंत्रित तेल ने चट्टान को उडाकर सिंधु सेवड़ा की और रवाना कर दिया सिंधु सेवड़ा ने चट्टान देखकर अनुमान लगाया कि रानी उस पर बैठकर उसके पास आ रही सो उसने अभिमंत्रित तेल को रानी को सीधे अपनी छाती पर उतारने का आदेश दिया|

जब चट्टान पास आई तब तांत्रिक को असलियत पता चली तो उसने आनन् फानन में चट्टान उसके ऊपर गिरने से पहले भानगढ़ नगर उजड़ने का शाप दे दिया और खुद चट्टान के नीचे दबकर मर गया| कहते है सिद्ध रानी को यह सब समझते देर ना लगी और उसने तुरंत नगर खाली कराने का आदेश दे दिया| इस तरह यह नगर खाली होकर उजड़ गया और रानी भी तांत्रिक के शाप की भेंट चढ गई|

कितनी सच्चाई है इस कहानी में –

इस कहानी में कितनी सच्चाई है इसके बारे में इस बात से ही जाना जा सकता है कि जनश्रुतियों में भानगढ़ के लिए प्रचलित कहानी में कई लोग रत्नावती को राजकुमारी तो कई लोग रानी बतातें है| रानी रत्नावती का जिक्र तो हर कोई करता है पर वह किस राजा की रानी थी ? 
उसके राजा व उसका शासन काल कौनसा था? 
नगर किस काल में उजड़ा ? 
इस प्रश्नों पर सब चुप है| अक्सर लोग इस नगर व किले को ५०० वर्ष पहले उजड़ा बताते है पर किले से मिले विभिन्न राजाओं के शिलालेखों की तारीख देखने के बाद उसके उजड़ने की समय सीमा काफी कम हो जाती है| हमने अपनी यात्रा में एक मंदिर (शायद मंगला देवी या केशवराय) के गर्भगृह के द्वार पर लगी एक बड़ी शिला पर संवत १९०२ लिखा देखा इस हिसाब से उस मंदिर के निर्माण का काल संवत १९०२ है तो जाहिर है आज से १६७ वर्ष पुर्व यह नगर आबाद था| 



भानगढ़ का इतिहास 


अपने पास उपलब्ध इतिहास की पुस्तकों में मुझे भानगढ़ के बारे में ज्यादा जानकारी तो नहीं मिली पर कुंवर देवीसिंह मंडावा ने अपनी पुस्तक “राजस्थान के कछवाह” में भानगढ़ के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी जरुर दी| अब तक मुझे मिली भानगढ़ के किले की ऐतिहासिक जानकारी के आधार पर भानगढ़ का किला जो आमेर के राजा भगवंतदास ने बनाया था उनके छोटे बेटे माधवसिंह (माधोसिंह) को मिला| भगवंतदास का स्वर्गवास मंगसर सुदी ७ वि.स. १६४६, १५ दिसम्बर १५९० को लाहौर में हुआ था| इसलिए यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि इस समय के आस-पास इस किले की राजगद्दी पर माधवसिंह बैठे थे| इनके अधीन मालपुरा भी था व मुंहता नैणसी के अनुसार अजमेर भी था |माधवसिंह (माधोसिंह) अपने बड़े भाई आमेर के राजा मानसिंह की भांति ही बहुत वीर पुरुष थे उन्होंने शाही सेना में रहते हुए कई महत्वपूर्ण युद्धों में वीरता दिखाकर अपनी वीरता का लोहा मनवाया था| आमेर में इनकी वीरता के बहुत किस्से प्रचलित थे| एक बार वे आमेर आये थे कि आमेर किले के एक झरोखे से अचानक गिरने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई| जहाँ उनकी मृत्यु हुई वहां उनका एक स्मारक भी बना है| राजस्थान के इतिहासकार ओझा जी को भानगढ़ में माधवसिंह के दो शिलालेख मिले थे जिन पर माघ बदी एकम वि.स. १६५४ और दूसरे में १६५५ लिखा था| 

माधवसिंह (माधोसिंह) के बाद उनका पुत्र छत्रसाल जिसे छत्रसिंह के नाम से भी जाना जाता है भानगढ़ की गद्दी पर बैठा| छत्रसिंह अपने दो पुत्रों भीमसिंह व आनंद सिंह के साथ दक्षिण में शाही सेना से बगावत करने वाले खानजहाँ लोदी से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे| छत्रसिंह का एक पुत्र अजबसिंह भी था जिसने भानगढ़ के पास ही अजबगढ़ नाम से एक नगर बसाया और वहां किला बनवाया| अजबसिंह ने बलख युद्ध में अप्रत्याशित वीरता दिखाई थी| छत्रसिंह का भानगढ़ में मिले एक शिलालेख में आषाढ़ बदी १३ वि.स.१६७६ अंकित मिला है| छत्रसिंह का एक पुत्र उग्रसेन भी था पर गद्दी पर कौन बैठा उसका पता मेरे पास उपलब्ध पुस्तकों में नहीं मिला| पर भानगढ़ में मिले एक अन्य शिलालेख में माघ बदी एकम वि.स.१७२२ में इसी वंश का एक वंशज हरिसिंह गद्दी पर बैठा|

हरिसिंह के दो बेटे या उसके वंश के दो बेटे औरंगजेब के काल में मुसलमान बन गए थे जिनका नाम मोहम्मद कुलीज व मोहम्मद दहलीज था जिन्हें भानगढ़ राज्य मिला था इन दोनों भाइयों का एक शिलालेख भानगढ़ में मिला है जिस पर जेठ सुदी १४ १७५६ अंकित है| इन दोनों भाइयों के मुसलमान बनने व दिल्ली में मुग़ल सत्ता के कमजोर होने का फायदा उठाते हुए आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह ने इन दोनों भाइयों को मारकर भानगढ़ पर कब्ज़ा कर लिया था और इस राज्य को अपने अधीन कर माधवसिंह(माधोसिंह) के ही वंशजों को अपने अधीन जागीरदार बना दिया|

कुछ अनुतरित प्रश्न 

महाराजा सवाई जयसिंह जी द्वारा अपने अधीन करने के बाद इस किले का कौन कौन जागीरदार रहा? 
किले का प्रबंध व नियंत्रण किस जागीरदार के हाथों में रहा ? 
रानी रत्नावती जिसके बारे में कहा जाता है कि वह पास के ही एक गांव तीतरवाडा की रहने वाली थी किस जागीरदार की रानी थी ?
नगर कब और क्यों उजड़ा ? 
ऐसी कौनसी परिस्थितयां रही होगी कि जयपुर आमेर के शक्तिशाली शासकों के अधीन रहते हुए यह संपन्न और समृद्ध नगर वीरान हो उजड़ गया ?
पुरा शहर और महल उजड़ गया सभी निर्माण जमींदोज हुए पर वहां बने मंदिर सुरक्षित कैसे रहे ? 
ऐसे कई प्रश्न है जिनके निवारण के लिए शोध की आवश्यकता है| एक समय समृद्ध रहे भानगढ़ नगर के इतिहास को आपके लोगों के सामने रख सकूँ इसकी मैं पुरी कोशिश करूँगा| 

सिंधु सेवड़ा द्वारा नगर का नाश व भूतों का सच 


उजड़ा बाज़ार
इस किले व नगर के उजड़ने के संबंध प्रचलित कहानियों व जन-श्रुतियों की ऊपर चर्चा की जा चुकी है पर किले व नगर को देखने के बाद आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि किले व नगर का नाश किसी चट्टान द्वारा नहीं किया गया है बल्कि नगर उजड़ जाने व खाली हो जाने के कई वर्षों बाद तक आस-पास के ग्रामीणों व अन्य लोगों द्वारा खाली पड़ी इमारतों से जरुरत का सामान निकालने के चक्कर में इमारतें खंडहर में तब्दील हुई है वही किले व महलों को उनमें गड़े धन को निकालने के लिए चोरों द्वारा खुदाई करने के चलते नुक्सान पहुंचा है साथ ही पर्यटकों द्वारा भी नगर व महल की टूटी दीवारों पर चढ़ने के कारण नुकसान पहुंचा है|


सुरक्षित गोपीनाथ मंदिर
मजे की बात यह है कि नगर में बनी हवेलियाँ व बाजार में बनी दुकानें खंडहर में तब्दील हो गई पर भानगढ़ नगर में बने प्राचीन मंदिर वैसे के वैसे सुरक्षित है हाँ उनकी मूर्तियां जरुर गायब है| यदि प्राकृतिक विपदा या तांत्रिक द्वारा अपनी शक्ति से नगर का उजड़ना माना जाय तो फिर मंदिर कैसे बच गए ?
बात साफ है एक तो मंदिरों में लगे दरवाजे आदि घरों


         





Sunday, January 24, 2016

क्या है कैलाश पर्वत का रहस्य – तथ्य।


कैलाश पर्वत एक विशाल पर्वत है। यह प्रकृति की एक सुंदर
रचना ही है। माना जाता है यदि कोई पिरामिड
प्रकृति ने खुद बनाया है तो वह कैलाश पर्वत ही है।
प्राचीन सनातन ग्रंथों में भगवान शिव को कैलाश पर्वत
का स्वामी बताया गया है। पुरणों के अनुसार भगवान
शिव और माता पार्वती यहीं पर निवास करते हैं। आज
तथ्यों में हम आपको कैलाश पर्वत के कुध अद्भुत रहस्यों को
बतायेंगे। ध्यान से पढ़िये और जानिए इस पर्वत के बारे में।
कैलाश पर्वत …….दुनिया का सबसे बड़ा
रहस्यमयी पर्वत, अप्राकृतिक शक्तियों का
भण्डारक
एक्सिस मुंडी(कैलाश पर्वत) को ब्रह्मांड का केंद्र,
दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक
ध्रुव के रूप में, यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक
बिंदु है जहाँ चारों दिशाएं मिल जाती हैं। और यह नाम,
असली और महान, दुनिया के सबसे पवित्र और सबसे
रहस्यमय पहाड़ों में से एक कैलाश पर्वत से सम्बंधित हैं।
एक्सिस मुंडी वह स्थान है अलौकिक शक्ति का प्रवाह
होता है और आप उन शक्तियों के साथ संपर्क कर सकते हैं
रूसिया के वैज्ञानिक ने वह स्थान कैलाश पर्वत बताया
है।
भूगोल और पौराणिक रूप से कैलाश पर्वत महत्वपूर्ण
भूमिका निभाता हैं। इस पवित्र पर्वत की ऊंचाई 6714
मीटर है। और यह पास की हिमालय सीमा की चोटियों
जैसे माउन्ट एवरेस्ट के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता
पर इसकी भव्यता ऊंचाई में नहीं, लेकिन अपनी विशिष्ट
आकार में निहित है। कैलाश पर्वत की संरचना कम्पास के
चार दिक् बिन्दुओं के सामान है और एकान्त स्थान पर
स्थित है जहाँ कोई भी बड़ा पर्वत नहीं है। कैलाश पर्वत
पर चड़ना निषिद्ध है पर 11 सदी में एक तिब्बती बौद्ध
योगी मिलारेपा ने इस पर चड़ाई की थी।
कैलाश पर्वत चार महान नदियों के स्त्रोतों से घिरा है
सिंध, ब्रह्मपुत्र, सतलज और कर्णाली या घाघरा तथा दो
सरोवर इसके आधार हैं पहला मानसरोवर जो दुनिया की
शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका
आकर सूर्य के सामान है तथा राक्षस झील जो दुनिया
की खारे पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और
जिसका आकार चन्द्र के सामान है। ये दोनों झीलें सौर
और चंद्र बल को प्रदर्शित करते हैं जिसका सम्बन्ध
सकारात्मक और नकारात्मक उर्जा से है। जब दक्षिण चेहरे
से देखते हैं तो एक स्वस्तिक चिन्ह वास्तव में देखा जा
सकता है.
कैलाश पर्वत और उसके आस पास के बातावरण पर अध्यन
कर रहे रसिया के वैज्ञानिक Tsar Nikolai Romanov और
उनकी टीम ने तिब्बत के मंदिरों में धर्मं गुरुओं से मुलाकात
की उन्होंने बताया कैलाश पर्वत के चारों ओर एक
अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है जिसमे तपस्वी
आज भी आध्यात्मिक गुरुओं के साथ telepathic संपर्क
करते है।
” In shape it (Mount Kailas) resembles a vast
cathedral… the sides of the mountain are
perpendicular and fall sheer for hundreds of feet, the
strata horizontal, the layers of stone varying slightly in
colour, and the dividing lines showing up clear and
distinct…… which give to the entire mountain the
appearance of having been built by giant hands, of
huge blocks of reddish stone. ”
देखने में तो कैलाश पर्वत एक विशाल कैथेड्रल जैसा
है…..पर्वत एक दम सीधा सा है इसकी साइड्स भी एक दम
सीधी हैं और हजारों फीट तक की हैं, पर्वत की खाल कई
जगहों पर भिन्न है, पर्वत को अलग करने वाली रेखायें
साफ दिखाई देती हैं………इससे ऐसा प्रतीत होता है कि
इस पूरे पर्वत को किन्हीं बहुत ही विशाल हाथों ने
बनाया होगा।
(G.C. Rawling, The Great Plateau, London, 1905).
रूसिया के वैज्ञानिकों का दावा है की कैलाश पर्वत
प्रकृति द्वारा निर्मित सबसे उच्चतम पिरामिड है।
जिसको कुछ साल पहले चाइना के वैज्ञानिकों द्वारा
सरकारी चाइनीज़ प्रेस में नकार दिया था। वे आगे कहते हैं
” कैलाश पर्वत दुनिया का सबसे बड़ा रहस्यमयी, पवित्र
स्थान है जिसके आस पास अप्राकृतिक शक्तियों का
भण्डार है। इस पवित्र पर्वत सभी धर्मों ने अलग अलग नाम
दिए हैं। ”

महाभारत के ये 10 रहस्य जिसे आप नहीं जानते होंगे.


हिन्दू धर्म में महाभारत को पांचवा वेद माना जाता है।
साथ ही विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य भी है। इसमें दी
गई सारी बातें आज भी उतनी ही मान्य है जितनी उस
काल में थीं। अच्छे जीवन जीने की सारी जानकारी इस
एक ग्रंथ में है।
लेकिन क्या महाभारत जितनी हमारे सामने रखी गई है,
उतनी ही है। युद्ध के बाद महाभारत खत्म हो गई थी? क्या
युद्ध के बाद भी कुछ ऐसी बातें थीं, जो हम नहीं जानते?
आइए, जानते हैं महाभारत के बारे में वो रहस्य, जो शायद ही
आपने कभी सुने हों:
1. 18 का रहस्य
महाभारत में 18 के आंकड़े का विशेष महत्व है। महाभारत का
युद्ध 18 दिनों तक चला था। इसमें 18 अध्याय हैं। भगवान
श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान 18 दिनों तक
चला। गीता में भी 18 ही अध्याय हैं। कौरवों और पांडवों
की कुल सेना 18 अक्षोहिनी थी। युद्ध के भी मात्र 18
योद्धा ही जीवित बचे थे। हालांकि 18 के पीछे राज आज
तक राज ही है।
2. अश्वत्थामा
अश्वत्थामा गुरू द्रोण के पुत्र थे। द्रोणाचार्य के पुत्र को
श्री कृष्ण ने अमरता का श्राप दिया था, क्योंकि उन्होंने
ब्रह्मास्त्र का गलत प्रयोग किया था। इस कारण
श्रीकृष्ण अश्वत्थामा से क्रोधित हो गए और उसे श्राप दे
दिया कि वो उन सभी हत्याओं के पाप का बोझ ढोता
हुआ हजारों वर्ष तक निर्जन जगहों में भटकता रहेगा। उसके
शरीर से हमेशा रक्त की दुर्गंध आएगी। उसकी माथे की
मणी वाले स्थान पर एक घाव होगा तो सदैव रिस्ता
रहेगा। वो अपनी मृत्यु की तलाश में अकेला भटकता रहेगा।
आज भी कई जगहों पर अश्वत्थामा को देखे जाने की बात
कही जाती है। लेकिन इन बातों की सत्यता के बारे में कोई
दावा नहीं कर सकता।
3. विमान और परमाणु शस्त्र
मोहन जोदड़ो की खुदाई में मिले कंकाल में रेडिएशन का
असर मिला था। लोग इसे महाभारत के साथ जोड़ कर देखते
हैं। कहा जाता है कि उस समय में भी परमाणु बम हुआ करते
थे। उस काल के ब्रह्मास्त्र ही परमाणु बम थे। महाभारत में
सौप्तिक पर्व के अध्याय 13 से 15 तक ब्रह्मास्त्र के
परिणाम बताए गए हैं। हिंदू इतिहास के अनुसार 3 नवंबर
5561 ईसा-पूर्व को अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग
किया।
4. कौरवों का जन्म एक रहस्य
धृतराष्ट्र और गांधारी को 100 पुत्रों के पिता और माता
के रूप में जाना जाता है। लेकिन दोनो के शत् पुत्र नहीं,
बल्कि 99 पुत्र और 1 पुत्री थी। इन्हें कौरव कहा जाता
था। कुरू वंश के होने के कारण ही ये कौरव कहलाए।
गांधारी के गर्भ धारण करने के दौरान धृतराष्ट्र ने एक
दासी के साथ संबंध बनाए, जिसके चलते धृतराष्ट्र के 100
पुत्र हुए। वेदव्यास से गांधारी को पुत्री प्राप्ती के लिए
वरदान मिला। हालांकि गांधारी को कोई भी संतान
नहीं हुई। क्रोध में गाधांरी ने अपने पेट पर जोर से मुक्का
मार लिया, जिससे उसका गर्भ गिर गया। इस बात का
मालूम चलने पर वेदव्यास ने गांधारी को फौरन 100 कुएं
खुदवाने को कहा। साथ ही उन्होंमे घी भरवा कर मरे हुए
बच्चे का अवशेष उसमें डाल दिया। यहीं से कौरवों का जन्म
हुआ।
5. महान योद्धा बर्बरीक
बर्बरीक भीम का पौत्र था। उसने यह प्रण लिया था कि
वह हारे हुए पक्ष से लड़ेगा। कौरवों और पांडवो की पूरी
सेना को समाप्त करने लिए बर्बरीक को मात्र तीन बाण
ही पर्याप्त थे। यह जान कर भगवान कृष्ण ने ब्रह्माण का
भेस बना कर उससे दान में उसका शीश मांग लिया। शीश
दान करने के बाद बर्बरीक ने कृष्ण से प्रार्थना की कि वो
अंत तक युद्ध देखना चाहता है। श्री कृष्ण ने उनकी यह
प्रार्थना स्वीकार कर ली। श्री कृष्ण ने उनके शीश को
अमृत से नहलाकर सबसे ऊंची जगह पर रख दिया, जिससे वो
महाभारत का युद्ध देख सके।
6. राशियां नहीं थीं ज्योतिष का आधार
महाभारत काल में ज्योतिष, राशियों के आधार पर कुछ
नहीं बताते थे, क्योंकि उस वक्त राशियां नहीं थीं। ग्रह
और नक्षत्रों द्वारा इस काम को किया जाता था।
ज्योतिष विज्ञान का विस्तार इसके बाद ही हुआ।
7. महाभारत के महायुद्ध में विदेशों से भी लड़ाके हुए थे
शामिल
महाभारत के युद्ध में सिर्फ भारत के ही योद्धा नहीं,
बल्कि विदेशो से भी योद्धा शामिल हुए थे। यवन देश से
सेना ने युद्ध में भाग लिया था। साथ ही ग्रीक, रोमन,
अमेरिका जैसे देशों से भी योद्धाओं के इस संग्राम में
शामिल होने के प्रसंग सामने आते हैं। इसी आधार पर यह
माना जाता है कि महाभारत विश्व प्रथम विश्व युद्ध था।
8. महाभारत किसने लिखी
अधिकतर लोगों का जानना और मानना है कि महाभारत
वेदव्यास ने लिखी है। हालांकि यह अधूरा सच है। असल में
वेदव्यास कोई नाम नहीं, बल्कि एक उपाधि थी, जो वेदों
का ज्ञान रखने वालों को दी जाती थी। महाभारत की
रचना 28वें वेदव्यास कृष्णद्वैपायन ने की थी। इससे पहले 27
वेदव्यास हो चुके थे।
9. अभिमन्यु की मृत्यु किसने मारा?
लोग जानते हैं कि अभिमन्यु की हत्या चक्रव्यूह में सात
महारथियों द्वारा की गई। लेकिन यह भी

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Ye

अजब-गजब पेड़

                               अज़ब गज़ब पेड़

Bottle Tree (बोतल वृक्ष)
स्थान: नामीबिया
नामीबिया में पाया जाने वाला यह वृक्ष धरती पर सबसे
घातक पेड़ों में से एक है। इस वृक्ष का दूधिया रस बहुत
जहरीला होता है। पुराने जमाने में शिकारी अपने तीर को
जहरीला बनाने में इसका इस्तेमाल करते थे। चूंकि इसके तने
की शक्ल बोतल जैसी होती है इसलिए इसे बोतल वृक्ष कहा
जाता है। आमतौर पर यह पर्वतीय प्रदेशों में उगता है। बोतल
वृक्ष के फूल सुंदर होते हैं और प्राय: गुलाबी या सफेद रंग के
होते हैं, जो मध्य की ओर गहरे काले या लाल रंग के होते हैं।



Wawona Tree (रेडवुड)
स्थान: संयुक्त राज्य अमेरिका
वावोना पेड़ एक कोस्ट रेडवुड था जो कि संयुक्त राज्य
अमेरिका के योसमाइट राष्ट्रीय उद्यान के मैरिपोसा
ग्रोव में स्थित था। वर्ष 1881 में इसके तने को बीच में से
काटकर एक सुरंग बना दी गयी। तभी से यह एक लोकप्रिय
और आकर्षक पर्यटन स्थल बन गया था। सन 1969 में भारी
हिमपात तथा शिखर पर भार के चलते यह वृक्ष धराशायी
हो गया। ऐसा अनुमान है कि यह रेडवुड 2300 साल पुराना
था।


Teapot Baobab (ट्रीपॉट बाओबाब)
स्थान: मैडागास्कर
मैडागास्कर में ही मिलने वाले ये शानदार वृक्ष 1000 वर्ष
पुराने हैं। बाओबाब की यह एक संकटग्रस्त प्रजाति है। इसके
कई पेड़ 80 मीटर ऊंचे तथा उनके धड़ का घेरा 25 मीटर से भी
ज्यादा है। सूखे के दिनों में तने का फूला हुआ भाग पानी के
स्रोत का काम करता है। बहार के मौसम में इनके फूल महज
२४ घंटे टिकते हैं। इन फूलों का चित्र मैडागास्कर के 100
फ्रैंक के नोट पर अंकित किया गया है।




Pejibaye Palm
स्थान: कोस्टा रिका और निकारागुआ
यह मूलत: मध्य तथा दक्षिण अमेरिका का वृक्ष है।
हालांकि मुख्य रूप से यह कोस्टा रिका और निकारागुआ
में पाया जाता है। Pejibaye पेड़ का बाहरी हिस्सा कठोर,
काले, spikes से बना है जो उन्हें नीचे से ऊपर तक
गोलाकार आकार देता है। ये लगभग २० मीटर बढ़ते हैं। इसके
पत्ते ३ मीटर तक लंबे हो सकते हैं। अमेरिका के मूल निवासी
आमतौर पर इसका फल किण्वित (fermenting) के बाद खाने
में इस्तेमाल करते थे जो उनके आहार का एक प्रमुख हिस्सा
था। किण्वित फल आज भी बहुत लोकप्रिय हैं।


Crooked Forest ofGryfino
स्थान: पोलैंड
पश्चिम पोलैंड में ग्राइफिनो (Gryfino) के पास तकरीबन
400 अजीब पेड़ है। ऐसा माना जाता है कि इंसान के
यांत्रिकी दखल से ये घुमावदार हो गये हैं यद्यपि इन वृक्षों
का मकसद मालूम नहीं है। कुछ लोगों का अनुमान है कि
संभवत: इन्हें लकड़ी के फर्नीचर, हल या नाव के पेंदे बनाने के
इरादे से ऐसा कर दिया गया होगा। बहरहाल ये वृक्ष एक
रहस्य बने हुए हैं।





Burmis Tree(बर्मिस ट्री)
स्थान: कनाडा
अल्बर्टा के नजदीक कनाडा में स्थित यह एक देवदार का पेड़
है। इस पेड़ के बारे में ताज्जुब की बात यह है कि 1770 के
दशक में ही इसकी मौत हो गयी थी किन्तु यह आज भी बगैर
सड़े-गले खड़ा है। यह पेड़ 600-750 साल पुराना हो सकता है।
सन् 1998 में तेज हवा से यह गिर गया था लेकिन स्थानीय
लोगों ने इसे सहारा देकर फिर से खड़ा कर दिया। इसके कुछ
साल बाद कुछ शरारती लोगों ने इसकी एक डाल तोड़ दी।
स्थानीय लोगों ने एक बार फिर उस टूटी हुए डाल को
जोड़ दिया। ऐसा मानते हैं कि बर्मिस ट्री का दुनिया में
सबसे ज्यादा फोटो लिया गया होगा।


सनलैंड बाओबाब (Sunland baobab)
स्थान: दक्षिण अफ्रीका
सनलैंड बाओबाब नामक यह पेड़ दक्षिण अफ्रीका के
लिंपोपो प्रांत में स्थित है। इस पेड़ में एक छोटा-सा बार
बनाया गया है। यह पेड़ कुदरती तौर पर खोखला है तथा
1993 में इसमे एक बार खोल दिया गया जिसमें 15 से 20
लोग बैठ सकते हैं। यह दक्षिण अफ्रीका का सबसे ऊँचा और
बड़ा baobab पेड़ है। यह पेड़ 20 मीटर लंबा है तथा इसका
घेरा 47 मीटर है। यह दुनिया के सबसे पुराने पेड़ों में से एक है
जिसकी उम्र लगभग 6000 साल से अधिक हो सकती है।